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भ्रष्टाचार का खुलासा: पब्लिक लाइब्रेरी में अनियमितताओं की चौंकाने वाली सच्चाई

राजनगर, मधुबनी | 06 अप्रैल 2026 लेखक: प्रदीप कुमार नायक, स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार मधुबनी जिले के राजनगर स्थित पब्लिक लाइब्रेरी में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से लाइब्रेरी के नाम पर समाज के पैसों का दुरुपयोग किया जा रहा है, जबकि विका

भ्रष्टाचार का खुलासा: पब्लिक लाइब्रेरी में अनियमितताओं की चौंकाने वाली सच्चाई

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राजनगर, मधुबनी | 06 अप्रैल 2026 लेखक: प्रदीप कुमार नायक, स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार मधुबनी जिले के राजनगर स्थित पब्लिक लाइब्रेरी में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से लाइब्रेरी के नाम पर समाज के पैसों का दुरुपयोग किया जा रहा है, जबकि विकास कार्य लगभग नगण्य है । राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना वर्ष 1947 में हुई थी और यह सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकृत संस्था है। इसका उद्देश्य समाज में शिक्षा, जागरूकता और ज्ञान का प्रसार करना था। एक समय यह क्षेत्र के लोगों के लिए ज्ञान का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था, लेकिन वर्तमान स्थिति इन उद्देश्यों के विपरीत नजर आती है, जिससे समाज में असंतोष बढ़ रहा है । स्थानीय सूत्रों के अनुसार, पिछले लगभग 11 वर्षों से लाइब्रेरी में विकास कार्यों की बजाय केवल औपचारिक बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। आरोप है कि इन बैठकों में खाने-पीने और मौज-मस्ती पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि लाइब्रेरी की वास्तविक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। समाज के लोगों का कहना है कि यह सब सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है । लाइब्रेरी की आय के कई स्रोत बताए जा रहे हैं। इनमें 21 दुकानों से मिलने वाला किराया, शादी-विवाह और अन्य कार्यक्रमों के लिए हॉल तथा कमरों का किराया, और समय-समय पर मिलने वाला सरकारी एवं सामाजिक सहयोग शामिल है। इन सभी स्रोतों से हर महीने अच्छी-खासी आमदनी होने का दावा किया जाता है। इसके बावजूद लाइब्रेरी में न तो पर्याप्त किताबें उपलब्ध हैं और न ही आधारभूत सुविधाओं का समुचित रखरखाव किया जा रहा है। इससे यह सवाल उठता है कि आखिर यह पैसा जा कहाँ रहा है । कमेटी के गठन को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कमेटी का गठन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ। आरोप है कि योग्य और समाज में सक्रिय लोगों को नजरअंदाज कर कुछ लोगों ने जबरन अपने प्रभाव के बल पर समिति बना ली। यह भी कहा जा रहा है कि नियमों के अनुसार हर तीन वर्ष में चुनाव होना चाहिए, लेकिन पिछले 11 वर्षों से वही लोग पदों पर बने हुए हैं, जो व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है । समाजसेवियों और स्थानीय नागरिकों ने इस स्थिति पर खुलकर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि जब भी किसी ने इस अनियमितता के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, उसे नजरअंदाज किया गया या दबाने का प्रयास किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि संस्था के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन नहीं किया जा रहा है। लाइब्रेरी की वर्तमान स्थिति भी कई सवाल खड़े करती है। जहाँ एक ओर लाखों रुपये की आय की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर लाइब्रेरी में पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं की कमी साफ दिखाई देती है। भवन का रखरखाव भी संतोषजनक नहीं है, जिससे छात्रों और पाठकों को असुविधा का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि संस्था के मूल उद्देश्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। इस पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अब तक किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं होने से लोगों में यह धारणा बन रही है कि या तो प्रशासन इस मामले से अनजान है या जानबूझकर चुप्पी साधे हुए है। यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है। स्थानीय लोगों ने इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आय और व्यय का सही तरीके से ऑडिट कराया जाए और कमेटी के गठन की प्रक्रिया की जांच हो, तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। इससे न केवल दोषियों की पहचान होगी, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने में भी मदद मिलेगी। यह मामला केवल एक लाइब्रेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। जब सार्वजनिक संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होती, तो उसका सीधा असर समाज के विकास पर पड़ता है। खासकर युवाओं की शिक्षा और जागरूकता प्रभावित होती है, जो किसी भी समाज के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। अंततः यह आवश्यक है कि समाज, प्रशासन और संबंधित विभाग मिलकर इस समस्या का समाधान निकालें। नियमित चुनाव, पारदर्शी वित्तीय प्रणाली और सामाजिक भागीदारी जैसे कदम उठाकर ही इस संस्था को उसके मूल उद्देश्य की ओर वापस लाया जा सकता है। (लेखक: प्रदीप कुमार नायक, स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार) डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। seemanchallive.com इस खबर की पुष्टि नहीं करता है और प्रस्तुत तथ्यों के लिए जिम्मेदार नहीं है।

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