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क्या नेपाल में फिर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन रही है? राजनीतिक अस्थिरता, मधेस मुद्दा और युवाओं का उभार

Published: 10/03/2026, 03:11:48 am29 viewsSeemanchal Live

नेपाल में लगातार हो रहे राजनीतिक बदलाव, युवाओं के आंदोलनों और मधेसी असंतोष के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या देश फिर किसी बड़े टकराव या गृहसंघर्ष की ओर बढ़ रहा है। प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार नेपाल की राजनीति: बदलाव के बावजूद स्थिरता क्यों नहीं? नेपाल का राजनीतिक इतिहास बार-बार यह सवा

क्या नेपाल में फिर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन रही है? राजनीतिक अस्थिरता, मधेस मुद्दा और युवाओं का उभार
नेपाल में लगातार हो रहे राजनीतिक बदलाव, युवाओं के आंदोलनों और मधेसी असंतोष के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या देश फिर किसी बड़े टकराव या गृहसंघर्ष की ओर बढ़ रहा है। प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार नेपाल की राजनीति: बदलाव के बावजूद स्थिरता क्यों नहीं? नेपाल का राजनीतिक इतिहास बार-बार यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर क्यों यह देश हर कुछ वर्षों में आंदोलन, विद्रोह और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरता है। हाल ही में काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की बड़ी जीत ने नेपाल की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। माना जा रहा है कि वे जल्द ही देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं। यह चुनाव उस पृष्ठभूमि में हुआ है जब पिछले वर्ष “जेनरेशन-Z आंदोलन” ने नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था को झकझोर दिया था। युवाओं के गुस्से ने यह साफ कर दिया कि देश में लंबे समय से जमा असंतोष अब खुलकर सामने आ रहा है। नेपाल में बार-बार क्यों होते हैं आंदोलन? नेपाल का इतिहास बताता है कि देश कई क्रांतियों और राजनीतिक बदलावों से गुजरा है, लेकिन स्थिरता अभी भी दूर है। हर दशक में जनता सड़कों पर उतरती है, पुरानी सत्ता को चुनौती देती है और बदलाव की उम्मीद करती है। मगर अक्सर नतीजा अधूरा ही रह जाता है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन सामाजिक न्याय, समानता और मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ें गहरी नहीं हो पातीं। यही अधूरी उम्मीदें अगले आंदोलन को जन्म देती हैं। संघर्षों से भरा नेपाल का राजनीतिक इतिहास नेपाल का आधुनिक इतिहास संघर्षों और राजनीतिक प्रयोगों से भरा रहा है। 1814–1816: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य के बीच अंग्लो-नेपाल युद्ध 1846–1951: राणा शासन का निरंकुश दौर 1951: क्रांति के बाद लोकतंत्र की बहाली 1960–1990: पंचायती व्यवस्था और राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध 1996–2006: माओवादी जनयुद्ध, जिसमें 17 हजार से अधिक लोग मारे गए 2006: जनआंदोलन के बाद राजशाही का अंत और गणराज्य की स्थापना 2015: नया संविधान लागू इन सभी घटनाओं के बावजूद नेपाल स्थायी राजनीतिक स्थिरता हासिल नहीं कर सका। मधेस का सवाल: नेपाल की राजनीति का अहम मुद्दा नेपाल की राजनीति में मधेसी समुदाय का प्रश्न लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। मधेसी समुदाय देश की बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन उनका आरोप है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक संस्थाओं में उनकी भागीदारी सीमित रही है। संसद, प्रशासन, न्यायिक सेवा और सुरक्षा तंत्र में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण असंतोष समय-समय पर आंदोलन के रूप में सामने आता रहा है। जेनरेशन-Z आंदोलन और राजनीतिक उथल-पुथल 8 सितंबर 2025 को नेपाल में युवाओं के बड़े आंदोलन ने पूरे देश को हिला दिया। काठमांडू से लेकर बिराटनगर, जनकपुर, धरान और नेपालगंज तक विरोध प्रदर्शन हुए। यह आंदोलन लंबे समय से जमा निराशा और भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से का विस्फोट था। राजनीतिक दबाव के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा। राजशाही की वापसी की मांग भी उठ रही नेपाल में एक और दिलचस्प राजनीतिक धारा सामने आ रही है। कुछ समूहों का मानना है कि राजशाही के समय देश में अधिक स्थिरता थी। इस कारण समय-समय पर राजशाही समर्थक प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं। हालांकि नेपाल का संविधान देश को गणराज्य घोषित करता है, फिर भी यह बहस राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है। बालेन शाह से नई उम्मीदें काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह की लोकप्रियता युवाओं के बीच तेजी से बढ़ी है। अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनके सामने कई बड़ी चुनौतियाँ होंगी— राजनीतिक स्थिरता स्थापित करना आर्थिक सुधार युवाओं के लिए रोजगार मधेसी और अन्य समुदायों के मुद्दों का समाधान क्या नेपाल फिर किसी बड़े संघर्ष की ओर? नेपाल का इतिहास बताता है कि जब भी जनता की उम्मीदें अधूरी रह जाती हैं, तब आंदोलन जन्म लेते हैं। आज नेपाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ नई राजनीति और पुराने असंतोष के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। यदि सभी समुदायों को साथ लेकर समावेशी विकास की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो राजनीतिक अस्थिरता फिर बड़े संकट का रूप ले सकती है।

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