मधुबनी जिले के अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही और मरीजों का आर्थिक दोहन बेहतर चिकित्सा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।लेकिन सच्चाई बिल्कुल विपरीत नज़र आते हैं।मधुबनी सदर अस्पताल में मरीजों का रेला मगर यहां भी हर रोग का डॉक्टर नहीं हैं।यहां हर तरह की जांच उपलब्ध नहीं हैं।यही कारण हैं कि सरकारी इलाज की व्यवस्था लड़खड़ाते और प्राइवेट वाले दौड़ रहे हैं।पेयजल का भी यहां घोर अभाव महसूस की जा रही हैं।मरीजों की परेशानी की बाबत पूछने पर चिकित्सको का रटा-रटाया जवाब कि सीमित संसाधनों में बेहतर इलाज का प्रयास चल रहा हैं।
मधुबनी सदर अस्पताल सहित जिले के राजनगर,खजौली, जयनगर,बेनीपट्टी, बासोपट्टी, झंझारपुर, लौकहा,अंधराठाढ़ी, बाबूबरही, खुटौना का सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही हैं।मगर अस्पतालों में डॉक्टरों और बेड़ों की संख्या नही बढ़ाई जा रही हैं।इतना ही नही इन सरकारी अस्पतालों में सरकार की ओर से घोषित दवाईयां भी उपलब्ध नही हैं।मरीजों को पुर्जा थमाकर बाहर से खरीदकर ईलाज के लिए दवाई लाने को कहना आम बात हैं।साधारण बीमारी वाले मरीजों को भी तुरंत रेफर कर दिया जाता हैं।मधुबनी जिला सहित पूरे राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था पटरी से उलट गई हैं।गरीब लोग बिना इलाज कराए मौत को गले लगाने को विवश हैं और सरकार चैन की बंशी बजा रही हैं।
राज्य सरकार लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना चाहती हैं।देश के बड़े राजयो में बिहार सरकार स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करती हैं।बजट में महज तीन फीसद ही स्वास्थ्य की हिस्सेदारी हैं।नेशनल हेल्थ प्रोफाइल की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सालाना खर्च महज 431 रुपये हैं।राष्ट्रीय औसत एक हजार 112 रुपये हैं।पड़ोसी राज्य झारखंड बिहार से अधिक राशि खर्च करता हैं।झारखंड में एक साल में प्रत्येक व्यक्ति पर 716 रुपये खर्च किए जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए।मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मानक के तहत 1681 व्यक्ति पर एक डॉक्टर होना चाहिए,बिहार में 17,685 की आबादी पर एक ही डॉक्टर उपलब्ध हैं।मानक के हिसाब से प्रदेश में ग्यारह करोड़ की आबादी के लिए 65 हजार 437 डॉक्टरों की जरूरत हैं।इसके विपरीत सरकारी अस्पतालों में करीब 30 से 32 हजार डॉक्टर कार्यरत हैं।25 हजार प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं।सामान्य स्वास्थ्य सेवा संवर्ग के तहत जनरल मेडिकल ऑफिसरों के कुल 57777 पद स्वीकृत हैं।जबकि 4053 डॉक्टर ही कार्यरत हैं।इस तरह 1724 पद रिक्त हैं।विशेषज्ञ डॉक्टरों के स्वीकृत पद 2775 हैं।जिसमें 782 लोग पद स्थापित हैं।नौ सरकारी मेडिकल अस्पतालों में 1654 चिकित्सक शिक्षक कार्यरत हैं।इसमें 168 प्रोफेसर,244 एसोसिएट प्रोफेसर,615 असिस्टेंट प्रोफेसर,217 ट्यूटर और 410 सीनियर रेजिडेंट कार्यरत हैं।बिहार मेडिकल रजिस्ट्रेशन काउंसिल में निबंधित डॉक्टरों की संख्या 55 हजार के करीब हैं।इसमें वैसे डॉक्टर भी शामिल हैं,जिनकी मृत्यु हो चुकी हैं।कई निबंधित चिकित्सक विदेश या दूसरे राज्य में चले गए हैं।
डॉक्टर, नर्स और पैरा मेडिकल स्टॉफ की कमी की वजह से प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में स्वास्थ्य मानक का अनुपालन नहीं हो रहा हैं।कई अस्पताल में स्वास्थ्य मानक का अनुपालन नहीं हो रहा हैं।कई अस्पताल एक-दो डॉक्टर के दम पर चल रहे हैं।कई जिले में एक सरकारी डॉक्टर पर हजार मरीजों को ईलाज करने की जिम्मेदारी हैं।डॉक्टरों की कमी के चलते सातों दिन चौबीस घंटे ईलाज की व्यवस्था करने की योजना गति नही पकड़ पा रही हैं।ए ग्रेड नर्स के 4,704 स्वीकृत पद के विरुद्ध 2,096 ही कार्यरत हैं।इसी तरह से संविदा पर 2,500 स्वीकृत पद हैं।जबकि 168 ही कार्यरत हैं।ए एन एम के 21,859 स्वीकृत पद हैं।जबकि 12,134 कार्यरत हैं।संविदा पर 12,659 पद के विरुद्ध 5,758 ही काम कर रही हैं।
राज्य सरकार द्वारा सरकारी अस्पताल में मरीजों को नि:शुक्ल दवाएं मुहैया कराई जाती हैं।मधुमेह, कैंसर,ह्रदय समेत कई जीवन रक्षक दवाओं को भी इसमें शामिल की गई हैं।सरकारी अस्पतालों में 310 प्रकार की दवाएं नि:शुक्ल उपलब्ध कराने का दावा किया गया।जबकि मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में पहले 181 प्रकार की दवाएं मिलती थी,जो बढ़कर 225 हो गई हैं।जिला अस्पतालों में दवा 123 से बढ़कर 167 हो गई हैं।स्वास्थ्य विभाग के दावा के बावजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से लेकर मेडिकल कॉलेज अस्पताल को पूरी दवाईयां कभी नहीं उपलब्ध कराई गई।अस्पताल में दवा उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर मरीजों को बाहर से दवा खरीद लेने की।सलाह दी जाती हैं।
मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं शहरी अस्पतालों पर बोझ कम करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ,सदर अस्पताल, अनुमंडल अस्पताल में गंभीर बीमारी का इलाज एवं जांच की सुविधाएं उपलब्ध कराया जाना था।इसकी शुरुआत काफी जोर शोर से की गई,मगर साकार नहीं हो सका।विशेषज्ञों की कमी ,जांच उपकरण के अभाव के कारण मरीजों को शहर की ओर रुख करना पड़ता हैं।ह्रदय, कैंसर, किडनी एवं यूरोलॉजी रोग इलाज कराने के लिए मरीजों के सामने दरभंगा एवं पटना के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं हैं।
केन्द्र सरकार देश में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने के लिए हर साल मेडिकल कॉलेज की संख्या बढ़ाने,एम बी बी एस एवं पी जी की सीटें बढ़ा रही हैं।लेकिन इसका लाभ बिहार नही उठा पा रहा हैं।इसकी सबसे बड़ी वजह चिकित्सक शिक्षकों की कमी हैं।शिक्षकों की कमी के कारण कॉलेजों में सीटें तो नही बढ़ाई जा रही हैं।बल्कि सिटें कम होने का खतरा मंडराता रहता हैं।नए-नए विषयों में पढ़ाई की योजना भी साकार नही हो पा रही हैं।
इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड ने आबादी के अनुरूप अस्पतालों की स्थापना की अनुशंसा की हैं।प्रति पांच हजार की आबादी पर एक स्वास्थ्य उप केन्द्र होना चाहिए।प्रदेश में 9,696 स्वास्थ्य उप केन्द्र हैं।मानकों के अनुसार 20 हजार स्वास्थ्य उप केन्द्र होना चाहिए।इसी तरह 30 हजार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र होना चाहिए।जबकि 533 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ही संचालित हो रहें हैं।मानकों के।
मुताबिक 3,666 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की आवश्यकता हैं।इसी तरह पचास लाख की आबादी पर एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल होना चाहिए।इस हिसाब से राज्य में 21 से 22 मेडिकल कॉलेज होना चाहिए।जबकि राज्य में नौ सरकारी मेडिकल एवं तीन तीन निजी मेडिकल कॉलेज अस्पताल हैं।
मालूम हो कि जेनरिक दवाईयां ब्रांडेड या फार्मा की दवाईयां के मुकाबले सस्ती होती हैं।जबकि प्रभावशाली उनके बराबर ही होती हैं।इस योजना के अनुसार यह भी सुनिश्चित करना हैं कि सरकारी अस्पतालों एवं प्राइवेट क्लिनिक के डॉक्टर अपने प्रेस्किप्शन पर जेनरिक दवाईयां ही लिखे।साथ ही साथ डॉक्टर के लिखावट सुस्पष्ट होना चाहिए।जिससे कि कोई भी मेडिसिन दुकानदार उसे पढ़ सके और दवाईयां दे सके।आमतौर पर डॉक्टर अपने पर्ची में ऐसी भाषा में अस्पष्ट लिखावट में दवाईयों के नाम लिखते हैं,जो उन्हीं के पास के मेडिकल दुकानदार पढ़ते हैं।इस तरह डॉक्टर को दोहरा धंधा हो जाता हैं।अक्सर देखा जाता हैं कि डॉक्टर अपने आसपास ही पैथोलॉजिकल जांच से लेकर मेडिसिन की दुकान तक अपने ही क्लिनिक में खोल देते हैं और दवा के क्षेत्र में कुकुरमुत्ते की तरह खुल रही कंपनियों की दवा अपने पर्ची पर लिखते हैं,जो वही आसपास के दुकानों पर मिलता हैं।जिसमें बिक्री के हिसाब से डॉक्टरों को मोटा कमीशन मिलता हैं।
सदर अस्पताल मधुबनी जिले का सबसे बड़ा अस्पताल हैं,जहां से यह अपेक्षा रहती हैं कि रोगियों के लिए आवश्यकता की प्रायः सभी सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हैं।एक तरफ सूबे की सरकार आम जनता के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की डंका पिटती हैं और दूसरी ओर मरीजों का आर्थिक दोहन हो रहा हैं।कोई भी सरकार सरकारी अस्पताल की कुव्यवस्था एवं अव्यवस्था नहीं सुधार पाई।कारण किसी सरकार ने स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दें को गंभीरता से नहीं लिया।यदि लिया होता तो सदर अस्पताल सहित जिले की तमाम अस्पताल की यह दुर्दशा तो नहीं होती,जो अभी वर्तमान में हैं।
अस्पताल में डॉक्टर के समय से न आने और गायब रहने की शिकायत आम हैं।सरकारी अस्पतालों में जांच की सुविधा का अभाव,दवाओं की किल्लत,डॉक्टर और चिकित्साकर्मियों की कमी की समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं।इसके चलते ग्रामीण एवं सुदूर इलाके के लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने की सरकार की योजना पर सवाल खड़ा कर देता हैं।जिले में अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही की खबरें आती हैं।सूबे के बड़ा वर्ग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर आश्रित हैं।ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार बहुत जरूरी हैं।
लेखक - स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्र एवं चैनलों में अपनी योगदान दे रहें हैं।
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मधुबनी जिले के अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही और मरीजों का आर्थिक दोहन
मधुबनी जिले के अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही और मरीजों का आर्थिक दोहन बेहतर चिकित्सा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।लेकिन सच्चाई बिल्कुल विपरीत नज़र आते हैं।मधुबनी सदर अस्पताल में मरीजों का रेला मगर यहां भी हर रोग का डॉक्टर नहीं हैं।यहां हर तरह की जांच उपलब्ध नहीं हैं।यही कारण हैं

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