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Araria:- पलासमनी तमकुड़ा में निराकार स्वरुपिणी मां अष्टभूजा की होती पूजा

पलासमनी तमकुड़ा में निराकार स्वरुपिणी मां अष्टभूजा की होती पूजा कुर्साकांटा प्रखंड मुख्यालय से दस किलोमीटर पश्चिम दक्षिण बरजान नदी के किनारे पलासमनी तमकुड़ा गांव स्थित दुर्गा मंदिर में दुर्गा पूजा अनूठे तरह से की जाती है। अध्यात्म का अलख जगा रहे इस मंदिर में मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि मिट्टी स

Araria:- पलासमनी तमकुड़ा में निराकार स्वरुपिणी मां अष्टभूजा की होती पूजा

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पलासमनी तमकुड़ा में निराकार स्वरुपिणी मां अष्टभूजा की होती पूजा कुर्साकांटा प्रखंड मुख्यालय से दस किलोमीटर पश्चिम दक्षिण बरजान नदी के किनारे पलासमनी तमकुड़ा गांव स्थित दुर्गा मंदिर में दुर्गा पूजा अनूठे तरह से की जाती है। अध्यात्म का अलख जगा रहे इस मंदिर में मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि मिट्टी से बने सिर की पूजा विधि विधान से होती है। लेकिन निराकार स्वरुपिणी मां अष्टभुजा की पूजा होती है। हालांकि मंदिर की दीवार पर मां दुर्गा, मां काली, माता सरस्वती व बजरंगवली के भव्य फोटो लगे हैं। वैसे तो मंदिर में प्रत्येक दिन ग्रामीणों द्वारा पूजा अर्चना की जाती है। लेकिन दुर्गा पूजा के अवसर पर विशेष पूजा अर्चना होती है। प्रत्येक दिन पूजा के बाद कुमारी कन्या को भोजन कराने की प्रथा चली आ रही है। ग्रामीणों की मानें तो इस सिद्ध स्थल में मन्नतें मांगने वालों की हर मुरीदें पूरी होती है। मुरीदें पूरी होने पर श्रद्धालूओं के द्वारा महाप्रसाद का वितरण किया जाता है। हालांकि अष्टमी को छागर की बलि निषेध है। लेकिन नवमी के दिन करीब ढाई सौ से तीन सौ छागर की बलि दी जाती है। 75 वर्षीय ग्रामीण नारायण झा ने बताया कि पलासमनी तमकुड़ा स्थित दुर्गा मंदिर में वर्ष 1900 ई से पूजा अर्चना होती आ रही है। गांव के ही एक श्रद्धालु स्व बुटाय मंडल ने मां दुर्गा की मूर्ति बना कर पूजा अर्चना शुरु की थी। कुछ बर्षो तक काफी धूम धाम से पूजा अर्चना होती रही। एक बार की बात है कि दुर्गा पूजा को लेकर पूरे गांव में उत्सवी माहौल था। लेकिन इसी दौरान स्व बुटाय मंडल के परिवार के एक सदस्य की अकाल मौत हो गयी। इसके बाद से यहां पूजा बंद हो गई थी। हालांकि वर्ष 1930 में गांव के ही स्व गणेश झा, स्व सुधाकान्त झा, स्व अनमोल मिश्र व चिरंजीव मिश्र ने मंदिर में विद्वान पंडितों के देख रेख पर विधि विधान के साथ सिर स्थापित कर पूजा अर्चना शुरु किया गया। तब से ही दुर्गा पूजा के अवसर पर मूर्ति नहीं बना कर सिर की पूजा होती आ रही है।

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