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क्या हमें आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी पर खामोश रह जाना चाहिए ?

14 अप्रैल 2020 को जब देश बाबा साहब अम्बेडकर की 129 वी जयंती मना रहा था, तब नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, चिंतक, आलोचक व लेखक प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े को एनआईए ने हिरासत में ले लिया। कौन है आनंद ? आनंद तेलतुंबड़े भारत ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी चर्चित नाम है,वे अपनी तार्किक और सर्वथा मौलिक

क्या हमें आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी पर खामोश रह जाना चाहिए ?

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14 अप्रैल 2020 को जब देश बाबा साहब अम्बेडकर की 129 वी जयंती मना रहा था, तब नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, चिंतक, आलोचक व लेखक प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े को एनआईए ने हिरासत में ले लिया। कौन है आनंद ? आनंद तेलतुंबड़े भारत ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी चर्चित नाम है,वे अपनी तार्किक और सर्वथा मौलिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं,उनकी 30 से अधिक किताबें प्रकाशित हुई है और उनके शोध पत्र,आलेख,समीक्षायें व कॉलम विश्व भर में छपते रहे हैं। वे महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के राजुर गांव में जन्में,नागपुर के विश्वेश्वरैया नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पढ़े,बाद में उन्होंने आई आई एम अहमदाबाद से प्रबंधन की पढ़ाई की और भारत पेट्रोलियम कंपनी लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव प्रेसिडेंट बने,उनका कारपोरेट जगत से भी जुड़ाव रहा ,वे पेट्रोनेट के मैनेजिंग डायरेक्टर भी रह चुके हैं,उन्होंने आई आई टी खड़गपुर में अध्यापन भी किया और वर्तमान में वे गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में पढ़ाते थे। चर्चित बुद्धिजीवी के साथ ही उनका एक परिचय यह भी है कि वे बाबा साहब अम्बेडकर के परिवार के दामाद भी है,बाबा साहब के पौत्र प्रकाश अम्बेडकर के बहनोई । आनंद तेलतुंबड़े ने अपने कैरियर में कभी हिंसा जैसी गतिविधियों का समर्थन नहीं किया है,वे स्वयं लिखते हैं - " मेरा पांच दशकों का बेदाग रिकॉर्ड है,मैंने कारपोरेट दुनिया मे एक शिक्षक ,नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी के तौर पर अलग अलग भूमिकाओं में देश की सेवा की है।" निशाने पर रहे हैं तेलतुंबड़े ! चूंकि प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े बेहद मुखर आलोचक रहे हैं,वे हिंदुत्ववादी ताकतों के सदैव निशाने पर रहे है,सत्ता प्रतिष्ठान भी उनसे खफा रहा है,यहां तक कि अम्बेडकरवादी लोग भी उनकी असहमतियों से काफी असहज रहे हैं,ऐसे में आनंद तेलतुंबड़े निरन्तर सर्विलांस के शिकार होते आये हैं,जब वे आईआईटी खड़गपुर में शिक्षक थे,तब भी उनके फोन टेप किये गए है,दीगर वक्त में उनकी जासूसी तो होती ही रही है। उनके द्वारा की जाने वाली आलोचनाओं और सरकारों पर उठाये जाने वाले सवालों ने उन पर राज्य की निगरानी और प्रताड़ना को भी निरन्तर किया है,लेकिन जिस तरह से उनके घर अगस्त 2018 में पुलिस ने छापा मारा और उनकी अनुपस्थिति में गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के परिसर स्थित उनके आवास में पुलिस सिक्योरिटी गार्ड से जबरन डुप्लीकेट चाबी लेकर घुसी,वह स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। जिस वक्त यह छापामारी हुई,आनंद और उनकी पत्नी मुम्बई में थे,बाद में उनकी ओर से गोवा के बिचोलिम थाने में यह शिकायत दर्ज करवाई गई कि उनकी गैरमौजूदगी में उनके घर में घुसी पुलिस ने अगर वहां कुछ भी प्लांट कर दिया तो वे इसके ज़िम्मेदार न होंगे। 31 अगस्त 2018 को पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि उनको भीमा कोरेगांव की यलगार परिषद के आयोजन की साज़िश मामले में गिरफ्तार लोगों में से एक के कम्प्यूटर में एक चिट्ठी मिली है,जिसमें देश के प्रधानमंत्री की हत्या का षड्यंत्र रचा गया है,इस चिट्ठी में कॉमरेड आनंद का नाम है,पुलिस के मुताबिक वह कॉमरेड आनंद दरअसल आनन्द तेलतुंबड़े ही है। जबकि दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि आनंद तेलतुंबड़े के घर या कंप्यूटर से किसी तरह की कोई बरामदगी नहीं हुई है,फिर भी पुलिस ने सिर्फ नाम की साम्यता की वजह से आनन्द तेलतुंबड़े को साज़िश में शामिल मानते हुए पुणे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया,बाद में उच्चतम न्यायालय के दखल के बाद उन्हें और प्रसिद्ध पत्रकार गौतम नवलखा को रिहा किया गया। आखिर मामला क्या है भीमा कोरेगांव यलगार परिषद का ? वो कौन सी साज़िश है,जिसका इतना हल्ला मचाया जाता रहा है ? जैसा कि सब जानते हैं कि पुणे के नजदीक भीमा कोरेगांव नामक स्थान पर अंग्रेज़ो व पेशवाओं के मध्य हुई लड़ाई में अंग्रेज फ़ौज की तरफ से अदम्य साहस का परिचय देते हुए महज 500 महार सैनिकों ने हजारों पेशवा सैनिकों को हरा दिया था,इस जंग में 49 लोग शहीद हो गए ,जिनकी याद में 1 जनवरी को हर साल एक उत्सव मनाया जाता रहा है । 2017 में भीमा कोरेगांव युद्ध की 200 वी जयंती के मौके पर एक यलगार परिषद का आयोजन हुआ,जो 31 दिसम्बर 2017 को शुरू हुई और 1 जनवरी 2018 को समाप्त हुई,इस यलगार परिषद में शामिल होने आए लोग जब अपने घरों को लौट रहे थे,तब हिंदुत्ववादी भीड़ ने उनपर हिंसा की,इस हिंसा को फैलाने का आरोप दलित समुदाय ने संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे पर लगाया था,लेकिन महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इन्हें निर्दोष बताया। इसके बाद पुणे के एक व्यवसायी तुषार तामगुडे ने पुणे यलगार परिषद के आयोजकों के खिलाफ हिंसा भड़काने और भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवाई गई,इस पर त्वरित कार्यवाही करते हुए पुणे पुलिस ने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ,एक्टिविस्टों व वकीलों को गिरफ्तार कर लिया,जिनमें सुधा भारद्वाज ,सोमा सेन,रोना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग शामिल थे। साज़िश का पत्र ! यलगार परिषद मामले में पुणे पुलिस ने साज़िश का एक पत्र मिलने का दावा करते हुए यह सनसनीखेज खुलासा किया कि उसमें भारत के प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश की गई थी। जब इस तरह की बात सामने आई तो मामला अत्यंत संवेदनशील व उच्च स्तरीय हो गया और व्यापक छानबीन के नाम पर माओवादी संपर्कों व अर्बन नक्सल की धरपकड़ का अभियान चलाया गया। आनन्द तेलतुंबड़े को भी इसी पत्र के आधार पर आरोपी बनाया गया और उस वक्त भी गिरफ्तार किया गया,लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में उनको रिहा करने का आदेश दिया था,अब उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने द्वारा दी गयी राहत को समाप्त करते हुए आनन्द तेलतुंबड़े व गौतम नवलखा को आत्मसमर्पण करने को कहा है।जिसके फलस्वरूप आनन्द व नवलखा ने 14 अप्रैल को एनआईए के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। जब महाराष्ट्र में विकास अगाड़ी सरकार ने सत्ता ग्रहण की ,तब भीमा कोरेगांव के राजनीति प्रेरित मामले को वापस लेने की बातें सोशल मीडिया में काफी चली ,लेकिन फिर अचानक ही मामला केंद्रीय जांच एजेंसी एनआईए को सौंप दिया गया ,जिसके समक्ष 14 अप्रैल को आत्मसमर्पण किया गया। अपनी बारी आने का इंतज़ार ! एनआईए की हिरासत में जाने से पहले प्रोफेसर आनन्द तेलतुंबड़े ने देशवासियों के नाम एक चिट्ठी लिखी,जिसमें उन्होंने लिखा -"बड़े पैमाने पर उन्माद को बढ़ावा मिल रहा है और शब्दों के अर्थ बदल दिये गये हैं,जहाँ राष्ट्र के विध्वंसक देशभक्त बन जाते हैं और लोगों की निस्वार्थ सेवा करने वाले देशद्रोही हो जाते हैं। जैसा कि मैं देख रहा हूँ मेरा भारत बर्बाद हो रहा है।मैं आपको इस तरह के डरावने क्षण में एक उम्मीद के साथ लिख रहा हूँ ।खैर मैं एनआईए की हिरासत में जाने वाला हूँ और मुझे नहीं पता कि मैं आपसे वापस कब बात कर पाऊंगा?हालांकि मुझे उम्मीद है कि आप अपनी बारी आने से पहले बोलेंगे " अन्ततः 14 अप्रैल 20 को आनंद तेलतुंबड़े हिरासत में ले लिए गए,उन पर यूएपीए जैसा क्रूर कानून लागू किया गया है,यह पता नहीं है कि वे कब वापस लौट पाएंगे, क्योंकि इस तरह के कानूनों में वकील,दलील व अपील की संभावनाएं सीमित स्वरूप ग्रहण कर लेती है और न्यायिक सुनवाई में बहुत देर हो जाती है,इतनी देर की सिर्फ फैसले आते हैं,इंसाफ गौण हो जाता है। ऐसे विकट हालात में हमें प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े की चिट्ठी के अंतिम शब्दों में प्रकट खतरे को समझना होगा । [highlight bgcolor="#eeee22"]क्या वाकई हमें अपनी बारी आने तक इंतजार करना चाहिए ? या यह खामोशी तोड़कर आनंद जैसी स्वतंत्र आवाज़ों को कुचलने के लिए इस फासीवादी फ़साओ वाद के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए ? मुझे लगता है कि इस उत्पीड़न और दमन के खिलाफ हमें मुखर स्वर में बोलना चाहिये, क्योंकि अपनी बारी आने तक चुप्पी साध लेना ऐतिहासिक भूल साबित हो सकती है,जब राज्य का दमनचक्र आनंद तेलतुंबड़े जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त बुद्धिजीवी तक को कुचलने पर आमादा हो सकता है तो आम दलित वंचित की तो औकात ही क्या बचती है ?[/highlight] (लेखक: भंवर मेघवंशी, स्रोत: शून्यकाल डॉटकॉम)

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