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Bihar

लालू प्रसाद यादव: सत्ता, संघर्ष और रणनीति का 50 साल का राजनीतिक सफर

लालू प्रसाद यादव: सत्ता, संघर्ष और रणनीति का 50 साल का राजनीतिक सफर गाँव से पटना यूनिवर्सिटी तक लालू प्रसाद यादव का जन्म 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गाँव में हुआ। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी। पिता किसान थे और परिवार बड़े संघर्ष में गुज़र-बसर करता था। लेकिन लालू बचपन से ही तेज

लालू प्रसाद यादव: सत्ता, संघर्ष और रणनीति का 50 साल का राजनीतिक सफर

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लालू प्रसाद यादव: सत्ता, संघर्ष और रणनीति का 50 साल का राजनीतिक सफर गाँव से पटना यूनिवर्सिटी तक लालू प्रसाद यादव का जन्म 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गाँव में हुआ। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी। पिता किसान थे और परिवार बड़े संघर्ष में गुज़र-बसर करता था। लेकिन लालू बचपन से ही तेज-तर्रार और मिलनसार थे। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पटना के बीएन कॉलेज और फिर पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर किया। यहीं उनकी मुलाकात छात्र राजनीति से हुई। जेपी आंदोलन में एंट्री 1970 के दशक में जब जयप्रकाश नारायण ने “संपूर्ण क्रांति” का बिगुल फूंका, तो लालू प्रसाद यादव छात्र नेता के रूप में उभरकर आए। उन्होंने छात्रों और युवाओं को संगठित किया और आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। 1974 में वे पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष बने — और यहीं से उनकी पहचान पूरे बिहार में बनने लगी। 1977: सबसे युवा सांसद आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर में लालू यादव ने छपरा से लोकसभा चुनाव जीता। उस समय उनकी उम्र महज़ 29 साल थी। यह उनके लिए राष्ट्रीय राजनीति का पहला बड़ा कदम था। 1990: मुख्यमंत्री की कुर्सी 1990 में, जनता दल के भीतर सत्ता संघर्ष के बीच लालू यादव ने अपने जातीय समीकरण और संगठन क्षमता का इस्तेमाल कर मुख्यमंत्री पद हासिल किया। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के बीच उन्हें अपार समर्थन मिला। उनका नारा — "भूरा बाल साफ करो" (भू- ब्राह्मण, रा- राजपूत, बा- बनिया, ला- लाला) — राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावी लेकिन विवादास्पद रहा। मंडल राजनीति का मास्टरस्ट्रोक 1990 के दशक में जब वी.पी. सिंह ने मंडल कमीशन लागू किया, लालू यादव ने इसे पूरी ताकत से समर्थन दिया। इसने उन्हें पिछड़े वर्ग का सबसे बड़ा नेता बना दिया। मंडल राजनीति ने बिहार के सत्ता समीकरण पूरी तरह बदल दिए और लालू यादव लंबे समय तक राजनीति के केंद्र में बने रहे। “राज का मजा गरीब भी लेगा” लालू यादव ने सत्ता का इस्तेमाल सिर्फ विकास के लिए ही नहीं, बल्कि जातीय और सामाजिक संतुलन के लिए किया। उन्होंने प्रशासन में पिछड़े और दलित वर्ग के लोगों की भागीदारी बढ़ाई। उनकी छवि एक ऐसे नेता की थी जो गाँव-गाँव जाकर जनता से सीधे संवाद करता था, हंसी-मजाक करता था और लोगों की बोली में बोलता था। चारा घोटाला और राजनीतिक भूचाल 1996 में चारा घोटाला सामने आया, जिसमें सरकारी कोष से करोड़ों रुपये की हेराफेरी का आरोप लगा। लालू यादव के ऊपर भी आरोप लगे। 1997 में, जब गिरफ्तारी तय हुई, तो उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला — अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। इस कदम ने उन्हें सत्ता से बाहर नहीं किया, बल्कि पर्दे के पीछे से वे शासन चलाते रहे। राष्ट्रीय राजनीति और रेल मंत्री 2004 में यूपीए सरकार में लालू यादव को रेल मंत्रालय मिला। उनके कार्यकाल में भारतीय रेल ने मुनाफा कमाया, जिसे उन्होंने अपने चुनावी भाषणों में खूब भुनाया। उनके रेल सुधार मॉडल को IIM और हार्वर्ड में केस स्टडी के रूप में पढ़ाया गया। सत्ता से बाहर लेकिन गेम में इन 2013 में चारा घोटाले में सजा मिलने के बाद वे चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए। इसके बावजूद, उन्होंने अपने बेटों तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव को राजनीति में उतारा। तेजस्वी अब बिहार के डिप्टी सीएम रह चुके हैं और महागठबंधन की राजनीति में लालू यादव का अनुभव अब भी रणनीति तय करता है। अंदाज़, करिश्मा और विवाद लालू यादव के भाषण, देसी ह्यूमर, और बोलचाल का अंदाज़ उन्हें भीड़ में अलग बनाता है। वे कभी ट्रैक्टर चलाते हुए, कभी बकरी चराते हुए, तो कभी सोशल मीडिया पर मीम्स के जरिए चर्चा में रहते हैं। विरोधियों का कहना है कि उनके शासन में “जंगलराज” था, लेकिन समर्थक मानते हैं कि उन्होंने “सामाजिक न्याय” को राजनीति का केंद्र बना दिया। आज की स्थिति आज लालू यादव सक्रिय राजनीति में भले ही पहले जितना न हों, लेकिन बिहार की किसी भी बड़ी सियासी चाल के पीछे उनका दिमाग होता है। उनका जीवन सफर बताता है कि सत्ता सिर्फ कुर्सी पर बैठने से नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में जगह बनाने से कायम रहती है।

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