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पारंपरिक डांडिया की जगह बिक रही है अश्लीलता और टिकट

डांडिया और गरबा भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। नवरात्रि में खेले जाने वाले इन नृत्यों का मूल उद्देश्य देवी दुर्गा की आराधना और भक्तिभाव से जुड़ा था। लेकिन समय के साथ डांडिया अपनी परंपरा और धार्मिकता से भटक कर अब एक भौतिक प्रदर्शन, फूहड़ता और पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा ब

पारंपरिक डांडिया की जगह बिक रही है अश्लीलता और टिकट

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डांडिया और गरबा भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। नवरात्रि में खेले जाने वाले इन नृत्यों का मूल उद्देश्य देवी दुर्गा की आराधना और भक्तिभाव से जुड़ा था। लेकिन समय के साथ डांडिया अपनी परंपरा और धार्मिकता से भटक कर अब एक भौतिक प्रदर्शन, फूहड़ता और पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा बन गया है। पारंपरिक डांडिया का उद्देश्य डांडिया नृत्य देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच लड़ाई का प्रतीक था। डांडिया की छड़ियाँ देवी की तलवार का प्रतिनिधित्व करती थीं। महिलाएँ और पुरुष अलग-अलग समूह में खेलते थे और बीच में देवी माँ की स्थापना की जाती थी। नवरात्रि को साधना और ब्रह्मचर्य का पर्व माना जाता था। बदलते स्वरूप की हकीकत आज डांडिया सिर्फ एक फैशन शो और मनोरंजन बनकर रह गया है। आयोजक टिकट बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं (₹251, ₹451 और अब ₹301, ₹551 तक)। भक्ति गीतों की जगह फिल्मी और अश्लील गानों पर डांडिया खेला जा रहा है। महिलाओं-पुरुषों की पोशाकें और व्यवहार मर्यादा से भटक चुके हैं। कई लोग इसे धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि मौज-मस्ती और प्रेम-प्रदर्शन का मौका मानते हैं। धार्मिकता से भटकाव मंदिरों और आरती में जहाँ गिनती के लोग पहुँचते हैं, वहीं डांडिया कार्यक्रमों में सैंकड़ों-हजारों की भीड़ उमड़ती है। आस्था के बजाय मनोरंजन पर जोर दिया जा रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल संस्कृति के लिए खतरनाक है बल्कि धार्मिक आस्था को भी चोट पहुँचाती है। सांस्कृतिक ह्रास और सामाजिक प्रश्न मिथिला जैसी परंपरागत धरती पर भी अब डांडिया विकृत रूप में मनाया जा रहा है। समाज में सवाल उठते हैं कि धार्मिक आयोजनों में ऐसी अश्लीलता क्यों बढ़ रही है? आधुनिक डांडिया से बच्चों और युवाओं में नकारात्मक संस्कार फैल रहे हैं। शासन-प्रशासन और कानून बनाने वाले इस पर अंकुश लगाने के बजाय आँखें मूँद लेते हैं। नवरात्रि का असली स्वरूप नवरात्रि का अर्थ है — साधना ब्रह्मचर्य मंत्र जाप अंतरतम की शक्तियों को जागृत करना लेकिन आज यह उत्सव अपने पवित्र स्वरूप से दूर होकर केवल मनोरंजन और पाश्चात्य शैली का प्रतीक बनता जा रहा है। FAQs: डांडिया और नवरात्रि Q1. डांडिया नृत्य का मूल उद्देश्य क्या था? 👉 देवी दुर्गा और महिषासुर की प्रतीकात्मक लड़ाई का मंचन। Q2. आज डांडिया क्यों विवादों में है? 👉 क्योंकि अब यह भक्ति से हटकर फूहड़ता, फैशन और पाश्चात्य संस्कृति का प्रदर्शन बन गया है। Q3. क्या डांडिया में टिकट बिक्री और व्यावसायिकरण उचित है? 👉 धार्मिक आयोजनों को व्यवसायिक रूप देना समाज में असंतुलन और आस्था का ह्रास करता है। Q4. नवरात्रि का असली महत्व क्या है? 👉 साधना, उपासना, ब्रह्मचर्य और आत्मिक शक्ति की प्राप्ति। Q5. समाज में डांडिया की विकृति क्यों बढ़ रही है? 👉 आधुनिकता, फैशन, और प्रशासनिक लापरवाही इसके पीछे प्रमुख कारण हैं। निष्कर्ष डांडिया और नवरात्रि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। लेकिन जब इसे अश्लीलता, फैशन और पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंग दिया जाता है तो यह अपनी पहचान खो बैठता है। हमें इस परंपरा को उसके मूल स्वरूप में जीवित रखना होगा — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे भक्ति और संस्कृति के रूप में देखें, न कि केवल मनोरंजन के रूप में। प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार report

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