नई दिल्ली, 12 अक्टूबर 2026। देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे हर नागरिक के लिए खुले हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आम नागरिक हो या निर्वाचित जनप्रतिनिधि, हर व्यक्ति को कानून के तहत अपनी शिकायत अदालत के सामने रखने का अधिकार है।
मुख्य न्यायाधीश का यह बयान कांग्रेस नेता राहुल गांधी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य विपक्षी नेताओं की ओर से मुलाकात का समय मांगे जाने के बाद आया। विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने और ज्ञापन सौंपने के लिए मुख्य न्यायाधीश से मिलने का अनुरोध किया था। हालांकि, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इस मुलाकात में असमर्थता जताई और संबंधित मुद्दों पर न्यायिक प्रक्रिया अपनाने की बात कही।
मुख्य न्यायाधीश ने क्या कहा?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने बताया कि उन्हें विपक्षी नेताओं का पत्र मिला था और उन्होंने रविवार रात उसका जवाब दिया था। उन्होंने कहा कि जवाब में मुलाकात न कर पाने के कारण बताए गए हैं, लेकिन पत्र की विषयवस्तु गोपनीय रखी गई है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कोई भी आम नागरिक या निर्वाचित प्रतिनिधि याचिका दाखिल कर सकता है। अदालत शिकायतों पर कानून के अनुसार सुनवाई करेगी और जिन लोगों को कानूनी राहत मिलनी चाहिए, उन्हें नियमानुसार राहत दी जाएगी।
उनके बयान का मुख्य संदेश यह था कि अदालत तक पहुंचने का अधिकार सभी को है, लेकिन शिकायतों का समाधान निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।
विपक्ष किन मुद्दों को उठा रहा है?
कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान कई मतदाताओं के नाम हटाए जाने और सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल हैं। विपक्ष इस प्रक्रिया पर रोक लगाने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव सुधारों की मांग कर रहा है।
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च कर ज्ञापन सौंपने की योजना बनाई थी। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता और प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा लोकतंत्र के लिए जरूरी है।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का सत्यापन निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है। आयोग के अनुसार, मृत, स्थानांतरित या सत्यापन के दौरान नहीं मिल पाने वाले लोगों के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं। आयोग ने पक्षपात के आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे हैं, वे दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं।
इसलिए मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों से जुड़े राजनीतिक आरोपों और आयोग के पक्ष को अलग-अलग समझना जरूरी है। आरोपों का अंतिम निष्कर्ष संबंधित तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
दिल्ली में सुरक्षा और यातायात पर असर
विपक्ष के प्रस्तावित मार्च को देखते हुए दिल्ली के कई हिस्सों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा कारणों से छह मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास अस्थायी रूप से बंद किए गए और मध्य दिल्ली के कई मार्गों पर यातायात प्रतिबंध तथा डायवर्जन लागू किए गए।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना बताया गया। ऐसे हालात में यात्रियों को सलाह दी गई कि वे यात्रा से पहले मेट्रो और यातायात संबंधी आधिकारिक अपडेट देखें, ताकि उन्हें अनावश्यक परेशानी न हो।
अब आगे क्या होगा?
मुख्य न्यायाधीश के बयान से यह स्पष्ट हुआ कि विपक्ष की शिकायतों पर विचार के लिए अदालत में याचिका दाखिल करने का रास्ता खुला है। हालांकि, मुलाकात से इनकार का अर्थ यह नहीं है कि विपक्ष के आरोप सही या गलत साबित हो गए हैं। इन मुद्दों पर निर्णय तथ्यों, प्रस्तुत साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर ही होगा।
यह विवाद एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को चर्चा के केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में अदालत में लंबित मामलों की सुनवाई और संबंधित पक्षों की दलीलें इस मुद्दे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगी।
आपकी राय: मतदाता सूची से जुड़ी शिकायतों का समाधान किस तरह होना चाहिए—अदालत में कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से, निर्वाचन आयोग की जांच से या दोनों के जरिए? अपनी राय कमेंट में साझा करें।












